हरिण-मन की  दौड़ की कविता -मायामृग की समीक्षा मैं एक हरिण और तुम इंसान/कविता संग्रह/सुरेन्‍द्र डी सोनी/संस्‍करण 2013/पेपरबैक/पृष्‍ठ 144/मूल्‍य 70.00 रुपये मात्र/बोधि प्रकाशन, जयपुर/आवरण चित्र: कुंअर रवीन्‍द्रएक पाठकीय दृष्टि हरिण दौड़ता है…कभी बेलाग…कभी बेतहाशा..। कभी कुलांचे भरता अपनी मौज में, कभी प्राण बचाने को प्राण निचोड़कर पैरों में लिए हुए..। दौड़ना उसकी नियति है, विवशता...