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Chiragon ki raat

 

चिरागों की रात

 

मोहब्बत एक ही खुदाई कानून है| और जितने भी हुक्म आपको दिए गए हैं, मैं वह सारे उतारने आया हूँ, आपको स्वतंत्र करने के लिए…..

-          मीरदाद (किताब-ए-मीरदाद से)

 

लेखिका अमृता प्रीतम द्वारा संकलित या रचित यह पुस्तक (चिरागों की रात) उनकी एक ऐसी यात्रा को हमारे समक्ष रखता है जिसे समझना शायद मुश्किल है| पता नहीं यह लेखिका की कल्पना है सच्चाई| मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है| यह पुस्तक कुछ नहीं तो अपने आप को आइना तो दिखाता ही है| अगर इसे सच्चाई मान कर मैं कुछ लिखूं तो कहूँगा की लेखिका की यात्रा एक ऐसे स्थान की है जिसे दरवेशों का टीला कहा जाता है| लेखिका को उस टीले तक पहुंचाने में एक चरवाहा सहायता करता है|

चरवाहा लेखिका की सहायता करने से पूर्व कुछ सवाल करता है, जिसके अंश को मैं नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ:-

मैंने पूछा – बाबा तुम दरवेशों के टीले का रास्ता जानते हो?

उसने पूछा – तुम वहां जाने के लिए आई हो?

मैंने कहा – हाँ बाबा, बरसों से चली हुई हूँ वहां जाने के लिए|

कहने लगा – खाली हाथ आई हो न?

मैंने कहा हाँ बाबा, देख ले खाली हाथ आई हूँ|

बाबा ने पूछा – तुमें शोहरत का कोई छाप-छल्ला तो नहीं पहना हुआ|

मैंने दोनों हाथ आगे किये, खाली अँगुलियों और खाली बाहों वाले|

वह फिर मेरे माथे की तरफ देखता रहा, और पूछने लगा – कोई मगरूरी का कण तो माथे में नहीं रखा हुआ है?

मैं हंस दी, कहा – राँझा राँझा कहते मैं तो खुद राँझा हुई|

वो हंसा, बोला – लोग कितना-कितना भार उठाए फिरते हैं, तभी तो टीले पर नहीं पहुँचते|”

 

लेखिका जब दरवेशों के टीले पर पहुँचती है तो उस समय अँधेरी रात हो चुकी होती है| उसे समय समय पर कई नामी-गिरामी शायरों एवं गायकों और सूफी शान्तों के शेर, गजल, गीत, कवितायें सुनाई देती हैं| और जब जब ये शब्द आकाश में गूंजता है एक उजाला सा हो उठता है| इस “दरवेशों के टीले” को मैं कल्पना कहूँ या सच्चाई समझ नहीं आता क्यूंकि लेखिका ने अपने शब्दों में इस टीले को जीवित कर दिया है| लेखिका के अनुसार कई लेखक, गायक, शायर और शांत इस टीले पर हर साल आते हैं ताकि वो चिरागों वाली रात को अपनी खुली आँखों से देख सके| “दरवेश” का अर्थ है तपस्वी व्यक्ति| लेकिन ये तपस्वी किसी विशेष धर्म के नहीं हैं और ना ही किसी विशेष धर्म में इनकी रूचि है| इनकी रूचि है तो बस की धरती पर अमन और शान्ति फैले|

लेखिका आपको इस पुस्तक द्वारा कई शायरों के नज़्म प्रस्तुत करती हैं जिससे आपके दिमाग, दिल और मन के दरवाजे खुल जायेंगे| लेखिका के द्वारा प्रस्तुत किये गए ये नज़्म ही हमें यह यकीन करने पर मजबूर कर देते हैं की लेखिका, एक प्रसिद्द लेखिका के साथ साथ एक शायरा भी हैं|

“दरवेशों का टीला” एक स्थान है जहाँ पर कई दरवेश मिलकर अपने अपने नज्मों द्वारा याद करते हैं उस दरवेश को जिसे “मीरदाद” कहा गया है| लेखिका “मीरदाद” की कहानी भी बताती है| “किताब-ए-मीरदाद” जिसके रचियेता मिखाइल नैयेम हैं| लेखिका मिखाइल के जीवन की बारे में भी बताती है और यह भी बताती है की कैसे “किताब-ए-मीरदाद” से मिखाइल का परिचय हुआ| मैं वे कहानिया नहीं कहना चाहूँगा क्यूंकि यह आप स्वयं पढ़ कर जाने तो बहुत अच्छा होगा| क्यूंकि कुछ बाते ऐसी होती है जिनको समझना तो आसान होता है पर लिखना कठिन|

लेखिका खलील जिब्रान के जीवनी को भी हम सभी के साथ साझा करती है| लेखिका का “किताब-ए-मीरदाद” और “ओशो” से कुछ अलग सा ही रिश्ता नज़र आता है| लेखिका के कुछ लेखों पर इनका असर नज़र आता है|

लेखिका कुछ कहानियों के द्वारा, ऐसी कहानियां जिन्हें हम विश्वप्रसिद्ध कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, से हमें उस प्रेम-मोहब्बत-प्यार-इश्क का सबक सीखने की कोशिश करती है जिसे सीखना संभवतः हम लोगों के लिए आसान नहीं होता|

दोस्तों यह पुस्तक एक अलग ही पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है| यात्रा वृतांत का सिलसिला और नज्मों का प्रस्तुत होना आपको इस पुस्तक से बांधे रखता है| वहीँ, किताब-ए-मिरदाद, मिखाइल नेमे, खलील जिब्रान और कुछ विश्व प्रसिद्ध कहानिया आपके अन्दर इस जागृति की स्थापना करती है की मुझे किताब-ए-मिरदाद भी पढना है, मुझे खलील जिब्रान की “पैगम्बर” भी पढना है| शायरों के नाम और उनके द्वारा प्रस्तुत किये गए नज़्म, आपके अन्दर इनके बारे में जानने और इनको पढने की जिज्ञासा प्रदर्शित करते हैं|

आभार

राजीव रोशन