आशापूर्णा देवी

आशापूर्णा देवी

1. जीवन परिचय

 

  • जन्म : आशापूर्णा देवी का जन्म 8 जनवरी, 1909 को पश्चिमी बंगाल के कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता)  में हुआ था।

  • जीवन परिस्थितियां/पारिवारिक जीवन : आशापूर्णा जी का परिवार एक मध्यमवर्गीय परिवार था। इनके परिवार में पिता, माता और तीन भाई थे। इनके पिता एक अच्छे चित्रकार थे और इनकी माता की बांग्ला साहित्य में गहरी रुचि थी। पिता की चित्रकारी में रुचि और माँ के साहित्य प्रेम की वजह से आशापूर्णा देवी को उस समय के जानेमाने साहित्यकारों और कला शिल्पियों से निकट परिचय का अवसर मिला। उस युग में बंगाल में सभी निषेधों का बोलबाला था। पिता और पति दोनों के ही घर में पर्दा आदि के बंधन थे पर घर के झरोखों से मिली झलकियों से ही वे संसार में घटित होने वाली घटनाओं की कल्पना कर लेती थी।

  • शिक्षा : आशापूर्णा जी का परिवार कट्टरपंथी था इसलिए उन्हें स्कूल और कॉलेज जाने का सुअवसर नहीं मिला। लेकिन बचपन से ही उन्हें पढ़ने-लिखने और अपने विचारों की अभिव्यक्ति की सुविधाएँ प्राप्त हुई।

  • साहित्यिक रुचि : उनके घर में नियमित रूप से अनेक बांग्ला पत्रिकाएँ जैसे : प्रवासी, भारतवर्ष, भारती, मानसी-ओ मर्मबानी, अर्चना, साहित्य, सबूज पत्र आदि आती थी। जिनका अध्ययन और चिंतन उनके लेखन की नींव बना।

  • व्यक्तित्व : कला और साहित्यिक परिवेश की वज़ह से आशापूर्णा जी में संवेदनशीलता का भरपूर विकास हुआ। वे यथार्थवादी, सहज और संतुलित थी। सीधे और कम शब्दों में बात को ज्यों का त्यों कह देना उनकी विशेषता थी। उनकी निरीक्षण शक्ति गहन और पैनी थी और विचारों में गंभीरता थी। पूर्वाग्रहों से रहित उनका दृष्टिकोण अपने नाम के अनुरूप आशावादी था। वे मानवप्रेमी थी। वे विद्रोहिणी थी। ‘मैं तो सरस्वती की स्टेनो हूँ’ उनका यह कथन उनकी रचनाशीलता का परिचय देता है।

  • मृत्यु : आशापूर्णा देवी की मृत्यु 13 जुलाई, 1995 को 87 वर्ष की उम्र में हुई।

 

2. कार्यक्षेत्र : आशापूर्णा देवी की कर्मभूमि पश्चिमी बंगाल थी। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही आशापूर्णा देवी की लेखन यात्रा शुरू हो गयी और आजीवन वे  साहित्य से जुड़ी रही। उनकी रुचि शिल्प कला में भी थी। उनका शिल्प कौशल स्वाभाविक होने के साथ-साथ दक्षता लिए हुए था। वे नारी स्वतंत्रता की पक्षधर थी। अपनी धारदार लेखनी की मदद से उन्होंने नारी जीवन के विभिन्न पक्षों, उनकी पारिवारिक समस्याओं और समाज के विभिन्न पक्षों को उजागर किया है।

3. प्रमुख कृतियाँ :

3.1 उपन्यास : आशापूर्णा जी के प्रमुख उपन्यास इस प्रकार हैं :

  • प्रेम ओ प्रयोजन (1944)

  • अग्‍नि-परिक्षा (1952)

  • छाड़पत्र (1959)

  • प्रथम प्रतिश्रुति (1964)

  • सुवर्णलता (1966)

  • मायादर्पण (1966)

  • बकुल कथा (1974)

  • उत्‍तरपुरूष (1976)

  • जुगांतर यवनिका पारे (1978)

  • अन्य : मित्तिर बाडी, वलयग्रास, नेपथ्य संगीत, योग वियोग, नवजन्म, चैत की दोपहर में, दिकचिह्न, शायद सब ठीक है, स्वर्ग की खरीदारी, उत्तमा, उदास मन, प्यार का चेहरा, मंजरी, दोलना, नागफाँस, चारुशीला, त्रिपदी, जब प्रकाश ही न हो, सागर तन्या, मुखर रात्रि, मन-मंजूषा, पंछी उडा आकाश, हवीला, कृष्ण चूडा का वृक्ष, अपने अपने दर्पण में, अमर प्रेम, अविनश्वर, कभी पास कभी दूर, कसौटी, काल का प्रहार, खरीदा हुआ दुख, गलत ट्रेन में, दृश्य से दृश्यान्तर, न जाने कहाँ कहाँ, प्यार का चेहरा, राजकन्या, लीला चिरन्तन आदि।

3.2 कहानी : आशापूर्णा जी के प्रमुख कहानी संग्रह इस प्रकार हैं :

  • जल और आगुन (1940)

  • आर एक दिन (1955)

  • सोनाली संध्‍या (1962)

  • आकाश माटी (1975)

  • एक आकाश अनेक तारा (1977)

  • अन्य : किर्चियाँ, त्रिपदी, ये जीवन है, सर्पदंश,  ऐश्वर्य, इज्जत, नागिन की पूँछ, हथियार, वहम आदि

 

4. साहित्यिक योगदान : आशापूर्णा जी ने लगभग 225 कृतियाँ लिखी हैं। जिसमें 100 से अधिक उपन्यास है। 1940 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘जल और आगुन’ प्रकशित हुआ। ना केवल बांग्ला बल्कि हिंदी भाषी अंचलों में भी उनकी कृतियों को रुचि से पढ़ा जाता है। उनकी अनेक रचनाओं का सभी भारतीय भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है।

समाज द्वारा नारी पर लादे गए रूढ़िवादी बन्धनों, पूर्वाग्रहों और अर्थहीन परम्पराओं की वे विरोधी थी। उनके उपन्यास त्रयी, प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता और बकुलकथा में ऐसे ही विद्रोह का स्वर मुखरित हुआ है। ये उपन्यास ब्रिटिश साम्राज्य से लेकर आज के भारत की नारी की चेतना के क्रमिक विकास की अमर गाथाएं हैं। उन्होंने सदा यही कोशिश की कि घर की चारदीवारी में कैद, पर्दे में घुट-घुटकर जीने वाली बहू, बेटियाँ, माँ, पत्नी, पुरुषों की बनायी हुई इन दीवारों को तोड़ें और पराधीनता से हटकर खुली हवा में साँस ले।

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किए जाने के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में उनके उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ की संस्तुति में लिखा गया  है :

“प्रथम प्रतिश्रुति में बंगीय नारी की उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर क्रमिक विमुक्ति के इतिवृत को उद्धाटित किया गया है। समूची कथा एक तेजस्वी उपन्यास के रूप में विकसित हो उठी है, जिसका केन्द्र बिन्दु कथा नायिका सत्यवती है। उसका जीवन और संघर्ष है, और हैं, वे उपाय साधन जिनके द्वारा उसने क्रमश: उन्मुक्तता उपलब्ध की। कृति में तत्कालीन बांग्ला नारी की मनोहारी छवियां ही नहीं उकेरी गयी है, लेखिका ने मानव स्वभाव पर ऐसी सटीक टिप्पणियां भी प्रस्तुत की है, जिनकी प्रासंगिकता बहुत व्यापक है। इसमें रूपायित हो गयी है वह प्रक्रिया, जिसमें भारतीय नारीत्व उचित गरिमा पा सकी है।”

प्रथम प्रतिश्रुति के नाम से एक टीवी सीरियल भी बनाया गया।

मंजरी उपन्यास में वे लिखती हैं :

“ हमारे समाज में तो पुरुषों की हजारों गलतियाँ माफ हो जाती हैं और लड़कियों से जरा सी गलती हुई तो उन्हें त्याग दिया जाता है, निकाल दिया जाता है। हमेशा यही व्यवस्था चालू रहेगी क्या ? क्या हम कभी सोचेंगे तक नहीं कि पुरुष जाति के लिए यह एक लज्जाजनक बात है ? लड़कियों को अपराध की कड़ी सजा और पुरुषों को क्षमा का निर्देश देने वाले कौन हैं शास्त्रकार ?”

वे सिर्फ समस्या ही नहीं उठाती वरन उसके समाधान के प्रति भी आशान्वित है। वे कहती हैं :

“ शायद व्यवस्था में परिवर्तन आए। एक-एक युग के प्रयोजन के मुताबिक एक-एक तरह की कानून-सृष्टि होती है और अगले युग में जब तक वह कानून अचल नहीं हो जाता, तब तक चलता ही रहता है। विकृत विकलांग आकृति में भी चलता रहता है। इसीलिए आज इस समाज-व्यवस्था को कोई अस्वीकार कर रहा है, कोई इसका मजाक बना रहा है और कोई पुरखों की विधि-व्यवस्था मानकर हृदय से लगाए बैठा है। लेकिन अब वह दिन दूर नहीं। युग के प्रयोजन को देखते हुये नये कानून की सृष्टि होने लगी है।”

उनका उपन्यास ‘न जाने कहां कहां’  एक अवकाश प्राप्त विधुर प्रवासजीवन, उनके परिवार और उनके संबन्धियों की घटनाओं को लेकर लिखा गया है।  जिसमें अवकाश प्राप्त विधुर प्रवासीजीवन की लाचारी और विवशता का भी चित्रण है। इसे आशापूर्ण देवी कुछ इस प्रकार से बताती हैं :

“क्या विधवा होने के बाद, औरतें ही असहाय होती हैं? पुरुष नहीं?”

एक और जगह वे प्रवासीजीवन के द्वारा जीवन और दर्शन को गहराई से समझाते हुए लिखती हैं :

“अपने चारों ओर एक घेरा बना कर हम अपने को उसी में कैद कर लेते हैं; और फिर अपना ही दु:ख, अपनी वेदना, अपनी समस्या, अपनी अवसुविधा, इन्हें बहुत भारी, बहुत बड़ा समझने लग जाते हैं। और सोचते हैं कि हमसे बुरा हाल और किसी का नहीं होगा। हमसे बड़ा दुःखी इन्सान दुनिया में है ही नहीं। जब नज़र साफ कर आंखें उठा कर देखता हूं तो पाता हूं दुनिया में कितनी समस्याएं हैं। शायद हर आदमी दु:खी है। अपने को महान समझकर दूसरे को दुःखी करते हैं हम। अपने को असहाय जताकर दूसरे को मिटा डालते हैं हम।”

चैत की दोपहर उपन्यास में नारी की ईर्ष्या-भावना, अधिकार-लिप्सा और नैसर्गिक संवेदना को दर्शाया गया है। सुवर्णलता उपन्यास में नारी मन की अंतहीन छटपटाहट और संघर्ष को स्थापित किया गया था। नागफांस उपन्यास में व्यंग्य और रोचकता का पुट देखने को मिलता है। तूली की चित्रकारी उपन्यास पारिवारिक संबंधों में मिठास, द्वंद्व और विडम्बनाओं का विस्तृत चित्रण है। त्रिपदी उपन्यास गृहत्यागी तीन पात्रों दो युवक और एक युवती की रोचक कथा है। चारुशीला उपन्यास  यथार्थ और मनोविज्ञान से ओत-प्रोत कहानी है। मन मंजूषा, काल का प्रहार, फेरीवाली, नेपथ्य संगीत, स्वर्ग की खरीदारी आदि हमारे आस-पास फैले संसार की रोचक कहानियाँ है।

किर्चियाँ कहानी-संग्रह की ज्यादातर कहानियों में उन्होंने पारिवारिक समस्याओं का चित्रण किया है। किर्चियाँ कहानी बड़ी ही मार्मिकता से हमारे परिवारों में असहाय और अशक्त पड़ी वृद्धाओं की दयनीय अवस्था का चित्रण करती है । ऐश्वर्य कहानी में पति-पत्नी के बीच के विश्वासपूर्ण संबंध में दरार  पैदा करने की कोशिश को नाकामयाब किया गया है। इज्जत और नागिन की पूँछ  कहानियों में उच्च वर्ग की महिलाओं की समस्याओं को दर्शाया गया है। हथियार कहानी में एक पूर्व प्रेमिका अपने पति के हास्यास्पद और कायरतापूर्ण पलायन का मुँहतोड़ जवाब देती है।

वहम कहानी में नायिका कनक, अपने पति के आलसीपन से परेशान होकर उसे घर के भीतर भला-बुरा कहती है, जी भर कोसती है, परंतु बाहर कहीं भी पति के मान-सम्मान पर आंच नहीं आने देती, यहाँ तक कि अपने भाई तक को अपनी दयनीय स्थिति से अवगत नहीं कराती है। चरित्र का यह गुण उसे सामान्य से विशिष्ट बनाता है।

नारी की मूलभूत समस्याएं हमेशा एक जैसी ही रही है, बस उनका बाहरी स्वरुप और स्वभाव समय के साथ बदला है। अपनी कहानियों द्वारा आशापूर्णा जी ने महिलाओं के आत्मविश्वास को जगाया। आशापूर्णा जी ने दीर्घ काल तक समाज की कुंठाओं, संकट, संघर्ष जुगुप्सा और लिप्सा सबको समाहित कर सामाजिक संबंधों के हर्ष, उल्लास और उत्कर्ष को नया आकाश प्रदान किया है।

5. साहित्य की विशेषताएं  : आशापूर्णा जी एक प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार थी। उनकी अपनी एक विशिष्ट शैली थी। चरित्रों का रेखांकन और उनके मनोभावों को व्यक्त करते समय वे यथार्थवादिता को बनाये रखती थी। सच को सामने लाना उनका उद्देश्य रहता था। उनका लेखन आशावादी दृष्टिकोण लिए हुए था। उनके उपन्यास मुख्यतः नारी केन्द्रित रहे हैं। उनके उपन्यासों में जहाँ नारी मनोविज्ञान की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और नारी के स्वभाव उसके दर्प, दंभ, द्वंद और उसकी दासता का बखूबी चित्रण किया हुआ है वहीँ उनकी कथाओं में पारिवारिक प्रेम संबंधों की उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है।

उनकी कथाओं में तीन प्रमुख विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं – वक्तव्य प्रधान, समस्या प्रधान और आवेग प्रधान। उनकी कथाएं हमारे घर संसार का विस्तार हैं। जिसे वे कभी नन्ही बेटी के रूप में तो कभी एक किशोरी के रूप में तो कभी ममत्व से पूर्ण माँ के रूप में नवीन जिज्ञासा के साथ देखती हैं।

6. पुरस्कार व सम्मान : अपनी लेखन कुशलता और प्रतिभा से आशापूर्णा देवी ने उस समय के जानेमाने बांग्ला उपन्यासकारों के साथ प्रथम पंक्ति में सम्मानीय स्थान पाया। समय समय पर उन्हें कई पुरस्कारों से अलंकृत किया गया।

  • 1964 में उपन्यास  ’प्रथम प्रतिश्रुति’ के लिए आशापूर्णा जी को टैगोर पुरस्कार प्रदान किया गया।

  • कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘भुवन मोहिनी’ स्वर्ण पदक से उनका अलंकरण किया गया।

  • रवीन्द्र पुरुस्कार, लीला पुरस्‍कार आदि से उन्हें सम्मानित किया गया।

  • 1976 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

  • 1976 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित किया गया।

बांग्ला साहित्य में बंकिम चन्द्र बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, रविन्द्र नाथ टैगोर और शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

के पश्चात् आशापूर्णा देवी का अनमोल और अमिट  स्थान है।

7. सन्दर्भ :

8. बाहरी कड़ियाँ