suni ghati ka suraj shreelal shukla

सूनी घाटी का सूरज : श्रीलाल शुक्‍ल
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राकी गर्ग की एक समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी
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राग -दरबारी जैसे महान उपन्यास के लेखक श्री लाल शुक्ल का ये महतवपूर्ण उपन्यास सूनी घाटी का सूरज पुस्तक प्रेमियों की दृष्टि से इतना उदासीन कैसा रहा मुझे समझ नही आया। यह एक उपन्यास न होकर एक आत्मकथा अधिक लगता है या लेखक ने इतनी कुशलता से काल्पनिक रंगों का प्रयोग किया है कि सारी कल्पनाएँ सत्य सजीव और आस- पास घटित होती प्रतीत होती है। लेखक ने समाज के उन दुखद पहलुओ को उजागर किया है जहाँ प्रेम,सोच ,प्रतिभा सम्मान और पद सब व्यपार पर प्रतिष्ठित है। भावुकता और यथार्थ की बारीकियाँ बहुत ढंग से उपन्यास में मिलती है। सत्या जो उपन्यास के नायक रामदास के साथ पुरे पवित्र आस्था की तरह है कहती है,” इस प्रकार के मानसिक अस्तित्व का संकट को उसी को मानना चाहिए जो संकटों को स्थूल रूप से न जनता हो पर जो तीन दिन से भूखा हो उसे प्रवंचित प्रेमी का अभिनय करना अच्छा नही लगता वो बोला , यह भी विचित्र बात है। पेम पर भी तुम भरपेट वालों की मोनोपोली रहेग। मुझ जैसे को न प्रेम करने का अधिकार है न उसकी असफलता पर शोक करने का।”

पूरे उपन्यास में लेखक पग- पग पर समाज की व्यवस्था पर व्यंग करता हुआ उसकी विकृतियों को उभारता चलता है पर कहीं भी आक्रामक प्रहार नही करते, बस पाठक पढता जाता है और सोचता जाता है कि क्या हमने ही उस समाज का निर्माण किया है जहाँ योग्यता का कोई मूल्य नही है जिसके पास सम्पति सिफारिश और चालाकी नही है जिसके पास है तो सिर्फ लगन परिश्रम बुद्धि और उसका सत्य। उसी सत्य के सहारे वो जीवन की तमाम दुरूह विषमताओं का सामना कतरा है लकिन अंत में जब उसे पता लगता है कि वो कितना भी संघर्ष करे यहाँ पर उसकी योग्ता का व्यापार चलता रहेगा तो वो सारे अतीत की धूल झाड़ कर और सारे प्रलोभनों को त्याग कर उसी अँधेरीऔर सूनसान घाटी में उतरने का निर्णय करता है जहाँ उसकी सर्वाधिक आवयश्कता है।

” गाँवो में जाना।दलितों की शक्ति बनना।अशिक्षितों को विद्या देना।उनकी निराशा,उनकी मूर्छा को समाप्त कर उन्हें नयी चेतना देना। झुलसी हुई पहाडियों की छाया में,एक धूसर संध्या के मलिन आतंक में पाए हुए कुछ किशोर संस्कारों को साकार करना। ये सब महान उद्देश्य हैं।”
तुम देख नही रहे हो,यहाँ आकर ख्याति और उन्नति की सब
आकांक्षाओं का गला घोंटकर अपने जीवन्मृत बनाने के लिए तुम्ही क्यू चुने गए हो?
परन्तु मन में उठने वाले इन क्रूर भावों को दबाकर वो बार- बार अपने आप से कहता है यहाँ मै न आऊँगा तो और कौन आएगा ? किसी और को यहाँ आने की गरज ही क्या है ? और उपन्यास उसी संस्मरण के प्रारंभ में पहुँच जाता है यह गाँव का एक स्कूल था।” इसी गाँव के स्कूल के प्रारंभ से लेखक का संस्मरण प्रारंभ होता है और उपन्यास इसी स्कूल पर आकर समाप्त हो जाता है। उस स्कूल से जहाँ ” जैसे ही पंडित जी दिखाई देते, हम सब भाग कर अपनी- अपनी तख्तियों के साथ छप्पर के नीचे बैठ जाते और गला फाड़ -फाड़कर पढ़ते -एक अद्धे अद्धा ,दो अद्धे एक, तीन अद्धे डेढ।”

साभार :
राकी गर्ग
माया मृग