Makhanlal Chaturvedi

1. जीवन परिचय

  • जन्म : श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई नामक गाँव में 4 अप्रैल, 1889 को हुआ था।

  • जीवन परिस्थितियां/पारिवारिक जीवन : माखनलाल चतुर्वेदी जी का बचपन संघर्षमय था। बचपन में ये काफ़ी रूग्ण और बीमार रहा करते थे। इनका परिवार राधावल्लभ सम्प्रदाय का अनुयायी था। नृसिंह मंदिर के सामने मैदान में होने वाली रामलीला में वे राम और लक्ष्मण के किरदार निभाते थे। बचपन में मंदिर की गायें चराने के लिए वे नर्मदा  तट पर जाया करते थे। इनके पिता पंडित नंदलाल चतुर्वेदी ग्राम की पाठशाला में अध्यापक थे। 1930 में पंद्रह वर्ष की आयु में इनका विवाह बाबई में ही ग्यारसी बाई से हो गया था । पत्नी की उम्र तब 9 वर्ष की थी। उनकी एक कन्या संतान हुई जिसकी जल्द ही मृत्यु हो गयी। बीमारी के चलते पत्नी के देहांत भी 1914 में हो गया। उन्हें माता-पिता, परिवार व मित्रजनों ने दूसरे विवाह के लिए समझाया पर उन्होंने मना कर दिया और अकेले ही जीवन पथ पर निकल पड़े।

  • शिक्षा :  माखनलालजी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तिमरनी में अपनी बुआ के पास रहकर ग्रहण की। प्राथमिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बंगला, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं का अध्ययन किया।

  • साहित्यिक रुचि :

  • व्यक्तित्व : श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय कवि, कुशलवक्ता, एक दिग्गज पत्रकार, सफल संपादक और हिंदी के कुशल लेखक थे। वे स्वावलंबी थे। उनके निरभिमानी व्यक्तित्व व सोच का परिचय उनके इस कथन से मिलता है : “प्रभु करे सेवा के इस पथ में मुझे अपने दोषों का पता रहे और आडंबर, अभिमान और आकर्षण मुझे पथ से भटका न पाए।” हरिशंकर परसाई जी के शब्दों में : “वे महान कवि थे। निराले थे। अदभुत गद्य-लेखक थे। शैलीकार थे। राजनैतिक, समाजिक टिप्पणीकार थे। इतने गुणों से युक्त उनका एक ‘लीजेंडरी’ व्यक्तितत्व था। मझोले कद गौर वर्ण, चिंतनशील आंखों और लंबी नुकीली नाकवाले इस व्यक्तित्व में एक गजब कोमलता तथा दबंगपन था। यह आदमी जब मुंह खोलता या कलम चलाता तो लगता कि या तो ज्वालामुखी फ़ूट पड़ा है या नर्मदा की शीतल धार बह रही है।”

  • मृत्यु : 30 जनवरी, 1968 को 80 वर्ष की आयु में माखनलाल चतुर्वेदी जी का निधन हो गया।

2. कार्यक्षेत्र : प्रारंभ में 8 रुपये मासिक वेतन पर खंडवा में माखनलाल जी ने अध्यापन का कार्य शुरू किया। किन्तु सितम्बर 1913 में अध्यापन में मन ना लगने के कारण नौकरी छोड़कर ये पूरी तरह से पत्रकारिता, साहित्य और राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति समर्पित हो गए। माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे। उनकी पत्रकारिता में राष्ट्र विरोधी किसी भी बात को स्थान नहीं दिया जाता था।

3. प्रमुख कृतियाँ :

  • कृष्णार्जुन युद्ध (1918)

  • साहित्य के देवता (1942)

  • समय के पांव

  • अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि।

3.2 पद्य कृतियाँ :

  • हिमकिरिटिनी (1941) ,

  • हिम तरंगिनी (1949)

  • माता (1952)

  • युग चरण

  • समर्पण

  • मरण ज्वार

  • वेणु लो गूंजे धरा

  • बीजुरी काजल आँज रही आदि।

4. समालोचना : कहीं-कहीं माखनलाल चतुर्वेदी जी की भाषा शैली पर बेडौल होने का आरोप लगाया जाता है। आलोचकों के अनुसार इसमें व्याकरण की अवहेलना की गयी है। कहीं कठिन संस्कृत शब्दों का प्रयोग है तो कहीं बुन्देलखण्डी के ग्राम्य प्रयोग। सकारात्मक पहलु से सोचे तो ये कहा जा सकता है कि उनके लिए अभिव्यक्ति और उसकी मौलिकता ज्यादा महत्वपूर्ण थी और नियमों में बंधे रहना उन्हें स्वीकार्य नहीं था।

5. साहित्यिक योगदान : माखनलाल चतुर्वेदी जी सच्चे देशप्रेमी थे। माधवराव सप्रे के ‘हिन्दी केसरी’ ने सन् 1908 में ‘राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्कार’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी का निबंध प्रथम चुना गया।

 अप्रैल 1913 में खंडवा के हिन्दी सेवी कालूराम गंगराड़े ने मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके संपादन का दायित्व माखनलालजी को सौंपा गया। अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखने और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण ‘प्रभा’ का प्रकाशन बंद हो गया था।

 सन् 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान माखनलालजी ने गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ मैथिलीशरण गुप्त और महात्मा गाँधी से मुलाकात की।

 सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन और सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में इन्होंने सक्रिय योगदान दिया और अंग्रेजी हुकूमत को पहली गिरफ़्तारी देने का सम्मान पाया।

 सन् 1913 में कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा ‘प्रताप’ का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी के देशप्रेम और सेवाभाव से माखनलाल जी बहुत प्रभावित हुए। सन् 1924 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ़्तारी के बाद इन्होंने ‘प्रताप’ का सम्पादकीय कार्य- भार संभाला।

सन् 1919 में ये जबलपुर से ‘कर्मवीर’ राष्ट्रीय दैनिक के संपादक रहे। सप्रेजी की मृत्यु के बाद 4 अप्रैल 1925 को  जब खंडवा से माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ का  पुनः प्रकाशन किया तब उनका आह्वान था-

“आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर,  ऊँच और नीच, जीत और पराजित के भेदों को ठुकराइए। प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिए, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करें।”

 

‘कर्मवीर’ के 25 सितंबर 1925 के अंक में किसानों के सन्दर्भ में वे लिखते हैं- “उसे नहीं मालूम कि धनिक तब तक जिंदा है, राज्य तब तक कायम है, ये सारी कौंसिलें तब तक हैं, जब तक वह अनाज उपजाता है और मालगुजारी देता है। जिस दिन वह इंकार कर दे उस दिन समस्त संसार में महाप्रलय मच जाएगा। उसे नहीं मालूम कि संसार का ज्ञान, संसार के अधिकार और संसार की ताकत उससे किसने छीन कर रखी है और क्यों छीन कर रखी है। वह नहीं जानता कि जिस दिन वह अज्ञान इंकार कर उठेगा उस दिन ज्ञान के ठेकेदार स्कूल फिसल पड़ेंगे, कॉलेज नष्ट हो जाएँगे और जिस दिन उसका खून चूसने के लिए न होगा, उस दिन देश में यह उजाला, यह चहल-पहल, यह कोलाहल न होगा।”

 प्रभा, कर्मवीर और प्रताप जैसे पत्रों के संपादन द्वारा इन्होंने अंग्रेजी शासन का पुरजोर विरोध किया और युवाओं को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए मर-मिटने को प्रेरित किया। स्वतंत्रता के पश्चात् भी राष्ट्र रक्षा और राष्ट्र निर्माण का उद्घोष  इन्होंने अपनी प्रेषक कविताओं के माध्यम से किया।

समझौतों के खिलाफ उन्होंने हमेशा जनमानस में चेतना जागृत की। उन्होंने लिखा है :

“अमर राष्ट्र, उद्दण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र, यह मेरी बोली

यह सुधार समझौतों वाली, मुझको भाती नहीं ठिठोली।”

 सन् 1930 ई. में वे मध्य प्रांतीय साहित्यिक सम्मेलन के अध्यक्ष बने । सन् 1934 ई. में वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अंतर्गत साहित्य परिषद के अध्यक्ष बने। माखनलाल चतुर्वेदी ने ही मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित कराया था कि – ‘साहित्यकार स्वराज्य प्राप्त करने के ध्येय से लिखें।’

 2 दिसंबर, 1934 को नागपुर विश्वविद्यालय में भाषण करते हुए माखनलालजी ने साहित्य के संदर्भ में अपनी अवधारणा स्पष्ट की – “लोग साहित्य को जीवन से भिन्न मानते हैं, वे कहते हैं साहित्य अपने ही लिए हो। साहित्य का यह धंधा नहीं कि हमेशा मधुर ध्वनि ही निकाला करे। जीवन को हम एक रामायण मान लें। रामायण जीवन के प्रारंभ का मनोरम बालकांड ही नहीं किंतु करुण रस में ओतप्रोत अरण्यकांड भी है और धधकती हुई युद्धाग्नि से प्रज्वलित लंकाकांड भी है।”

माखनलाल जी ने कुल 19 पुस्तकें लिखीं। इसमें 10 कविता संग्रह, 2 गद्य काव्य, एक कहानी संग्रह, एक नाटक, 3 निबंधा संग्रह, एक संस्मरण और एक भाषण संग्रह शामिल है। माखनलाल जी की आरम्भिक रचनाओं में भक्तिपरक अथवा आध्यात्मिक विचारप्रेरित कविताओं का भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसलिए इनकी रचनाओं में वैष्णव परम्परा का घना प्रभाव दिखायी पड़ता है साथ ही निर्गुण, सूफ़ी आदि विचारधाराओं का भी समावेश है। ‘रामनवमी’ जैसी रचनाओं में देश-प्रेम और भगवत्प्रेम को समान धरातल पर उतारने का प्रयत्न स्पष्ट है। ‘झरना’ और ‘आँसू’ में भावों की गहराई और अनुभूतियों की योग्यता का स्वर प्रबल है।

 गद्य रचनाओं में ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ और ‘साहित्य देवता’ का विशेष महत्त्व है। ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ अपने समय की बहुत लोकप्रिय रचना रही है। पारसी नाटक कम्पनियों ने जिस ढंग से हमारी संस्कृति को विकृत करने का प्रयत्न किया, वह किसी प्रबुद्ध पाठक से छिपा नहीं है। ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ शायद ऐसे नाट्य प्रदर्शनों का मुहतोड़ जवाब था। ‘साहित्य देवता’ माखनलाल जी के भावात्मक निबन्धों का संग्रह है।

असहयोग आंदोलन के दौरान इन्हें बिलासपुर जेल में बंद किया गया था. जहाँ पर इन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध कविता पुष्प की अभिलाषा लिखी। इस कविता के माध्यम से इन्होंने सिर्फ अपनी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता सेनानियों के मनोभावों का चित्रण किया है।

 “चाह नहीं मैं सुरबाला के

गहनों में गूंथा जाऊँ ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में

बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव

पर हे हरि, डाला जाऊँ,

चाह नहीं देवों के सिर पर

चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली!

उस पथ पर देना तुम फ़ेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक।”

उनकी देश प्रेम की आग इस कविता में भी झलकती है :

“सूली का पथ सीखा हूँ

सुविधा सदा बचाता आया।

मैं बलि पथ का अंगारा हूँ

जीवन ज्वाल जलाता आया।”

 

6. साहित्य की विशेषताएं – भाषा / शैली आदि : माखनलाल जी की  पहली रचना ”रसिक मित्र” ब्रजभाषा में प्रकाशित हुई थी। उनकी रचनाएं खड़ी बोली में है। कहीं कहीं उन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है और कुछ स्थानों पर आवश्यकतानुसार उर्दू के शब्दों को भी अपनाया है।  उनकी शैली भावप्रधान है।  उनकी भाषा सुबोध, प्रवाहपूर्ण तो है ही, ओज और प्रसाद गुण से भी पूर्णत: संपन्न है। मुहावरों और सूक्तियों के प्रयोग से उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि हुई है। उनके  काव्य को चार श्रेणियों में रखा जा सकता है- राष्ट्रीयता, प्रेम, प्रकृति और अध्यात्म।

7. पुरस्कार व सम्मान : सन् 1943 ई. में वे जयपुर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये।

 माखनलाल जी के कविता संग्रह ‘हिमकिरिटिनी’ को सन् 1943 में ‘देव पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया जो उस समय का साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार था।

 ’हिम तरंगनी’ काव्य संग्रह के लिए सन् 1955 में इन्हें साहित्य अकादमी का प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया।

 ’पुष्प की अभिलाषा’ और ‘अमर राष्ट्र’ जैसी ओजस्वी रचनाओं के लिए इन्हें सागर विश्वविद्यालय ने सन् 1959 में डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया।

 सन् 1963 में इन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। 10 सितंबर, 1967 को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलालजी ने यह अलंकरण लौटा दिया।

 16-17 जनवरी, 1965 को माखनलाल चतुर्वेदी के सम्मान में मध्यप्रदेश शासन की ओर से खंडवा में ‘एक भारतीय आत्मा’ नागरिक समारोह का आयोजन किया गया। तत्कालीन राज्यपाल श्री हरि विनायक पाटसकर और मुख्यमंत्री पं. द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा हिन्दी के अग्रगण्य साहित्यकार-पत्रकार इस गरिमामय समारोह में उपस्थित थे। तब मिश्रजी के उद्गार थे- ‘सत्ता, साहित्य के चरणों में नत है।’

 भोपाल का माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय इन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है।

 डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने उनके काव्य सौष्ठव पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

“एक भारतीय आत्मा ने अपने प्रकृतिपरक जीवन की कर्मवाटिका में विश्वासों की क्यारियां निर्मित की हैं जिनमें देशभक्ति की हरियाली है। यत्र-तत्र इनमें भावों के पौधे लहलहा रहे हैं, आशा की लताएं झूम रही हैं। उनमें संकल्पों के फल और कामनाओं के पुष्प लग रहे हैं। साहस के कुंजों तले बैठकर वे संवेदना की सुरभि विकीर्ण कर रहे हैं।”

 महादेवी वर्मा  के शब्दों में -

“माखनलाल चतुर्वेदी विराट भारत की अखण्ड आत्मा हैं। उनके काव्य में हिमालय की गरिमा हरिताम्बरा धरती से बोली है। संकल्प और भावना, बुद्धि की तीव्रता, दर्शन की दुरूहता और जीवन की सहज छवि एक साथ ही उनके काव्य में मिलती है”।

 डॉ. रामविलास शर्मा के शब्दों में -

“माखनलालजी राजनीतिक कवि हैं। किंतु राजनीति अनुभूति बनकर उनकी कविता में प्रकट हुई है। उनका युगांतरकारी महत्व यह है कि उन्होंने उग्र राष्ट्रीय चेतना के साथ अपने काव्य में सूक्ष्म सौंदर्य बोध, आत्मविभोर गेयता और मोहक चित्तमयता को स्थान दिया”।

 उर्दू के नामवर साहित्यकार रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी’ ने कहा है -

“उनके लेखों को पढ़ते समय ऐसा मालूम होता था कि आदिशक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिन्दी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई। मुझ जैसे हजारों लोगों ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलालजी से ही सीखी।”

8. सन्दर्भ :

 

9. बाहरी कड़ियाँ