मैं एक हरिण और तुम इंसान

हरिण-मन की  दौड़ की कविता -मायामृग की समीक्षा
मैं एक हरिण और तुम इंसान/कविता संग्रह/सुरेन्‍द्र डी सोनी/संस्‍करण 2013/पेपरबैक/पृष्‍ठ 144/मूल्‍य 70.00 रुपये मात्र/बोधि प्रकाशन, जयपुर/आवरण चित्र: कुंअर रवीन्‍द्रएक पाठकीय दृष्टि

हरिण दौड़ता है…कभी बेलाग…कभी बेतहाशा..। कभी कुलांचे भरता अपनी मौज में, कभी प्राण बचाने को प्राण निचोड़कर पैरों में लिए हुए..। दौड़ना उसकी नियति है, विवशता भी, आनंद भी और व्‍यथा भी….। इंसान हरिण-मन की इस दौड़ को अलग- अलग समय में अलग-अलग तरह से देखता और समझता है। सुरेन्‍द्र डी सोनी की कविता इसी दौड़ की कविता है। उनके अपने मन की कविता – जिसे मन से कहा गया, मन में रचा गया। कविता के होने और बचे रहने की चिन्‍ता से शुरु करके कवि जीवन की उन तमाम गलियों में टेर लगाता आया है, जहां भी उसके मन का हरिण उसे ले जाता है अपने पीछे-पीछे। जीवन से भरपूर गलियां हैं कहीं, …सूखे कुंए-बावड़ी और कीचड़ भरे रास्‍ते भी हैं यहां…! कवि किसी से बचता नहीं, किसी से कन्‍नी नहीं काटता…! जीवन का हर वह रुप जो कवि को दिखता है, वह उसे निहारता है, उसे स्‍वीकार करता है और सतत अपना बनाते जाने की प्रक्रिया के बाद व्‍यक्‍त कर देता है। इस क्रम में कितने ही अप्रिय क्षण आते हैं, जिन्‍हें कहना अपनी ही निजता को उधेड़ना है, पर सुरेन्‍द्र इसे इस सहजता से कह देते हैं बिना किसी विचलन के…! यह सहजता सायास गढ़ी नहीं जा सकती, इसीलिए कवि के भीतर की हलचल पूरी ईमानदारी से शब्‍दों में आ जाती है।
रचनाकार यह भी जानता है कि अनुभूति जब अभिव्‍यक्ति के स्‍तर पर आती है तो उसके अर्थ खो बैठने का खतरा कम नहीं है। काग़ज़ उनकी बात का कफ़न ना बने, कहीं उसके भीतर का तूफान काग़ज़ पर आकर दम ना तोड़ दे। यह अभिव्‍यक्ति की चिन्‍ता मात्र नहीं है, उस गहरे संकट का वक्‍तव्‍य भी है जो मौजूदा समय में कविता के पूरे परिदृश्‍य में छाया हुआ है। कविता कब संकट में आती है, यह जानना तभी संभव है जब कविता के सरोकार साफ़ हों। सुरेन्‍द्र डी सोनी निजी पीड़ाओं के कवि नहीं हैं, वह निजी पीड़ा के बहाने पूरे सामाजिक ताने-बाने को टटोलते हैं। दाम्‍पत्‍य के बीच दरकते विश्‍वास को संकेतों मे कहते हैं। कभी बरसों पुराने राज़ भी भरी अदालत खोल देते हैं-
        जज साहब ने कहा
सबूत लाओ -
दोनों के वकीलों ने
चाबियां निकाल-निकालकर
जज साहब की मेज पर रख दीं…।
…इस तरह संबंधों के सारे समीकरण सुलझे भी तो एक नए उलझाव के साथ। यह उलझाव कवि का असमंजस नहीं, समाज की विडम्‍बना है जो किसी एक निर्णय के साथ खत्‍म नहीं होती, बल्कि एक स्‍तर पर मिटाई जाकर, अनेक स्‍तरों पर शुरु हो जाती है। यही वजह है कि रचनाकार अपने लिखने का गिनाना नहीं भूलता-
हां लिखता हूं
इस दिल की बेचैनी को
कभी बुझाने के लिए
कभी भड़काने के लिए…।
दिल की बेचैनी सिर्फ सामाजिक रिश्‍तों के बिखरने तक सीमित नहीं, वह जीवनानुभूतियों के विस्‍तार में उन सबसे प्रभावित है – जिसमें प्रेम है, मित्रता है, स्‍त्री का मन है और सभ्‍यता के वे सब पड़ाव हैं, जहां आकर वह हमेशा या कि कहें बार-बार ठिठक जाती है। संस्‍कृति और सभ्‍यता के बीच की टकराहट बहुत स्‍थूल नहीं है। इसलिए कविताओं में
यह दो पंक्तियों के बीच की खाली जगह में पढ़ी जा सकती है-
ओह! गाड़ी तो
बहुत लेट है –
भीड़ से दूर जाकर
नए दोस्‍त बनाएं
अगर चल रहा नेट है
नए युग ने वह सब बनाया, वह सब दिया जो दूरियां मिटा दे, ..और वह सब पैदा किया जो दूरियों पर ही टिका है…! एक ओर से लकीर बनाते जाने और दूसरी ओर से मिटाते चलने की यह यात्रा कहां जाकर ठहरेगी, कहना मुश्किल है। नेट पर हजारों-हजारों नए दोस्‍त बन गए, …और जहां जिस घर में साथ थे हम एक परिवार के लोग…! उनके बीच भींतें खड़ी हो गईं। हर दीवार इन्‍सानियत का बंटवारा है, हर दीवार एक वक्‍तव्‍य है नई दुनिया के भीतर की सच्‍चाई को परत दर परत खोलता। सुरेन्‍द्र डी. सोनी का कवि पुराने और नए के द्वन्‍द्व को पहचानकर चुप नहीं रहता, उसे आवाज़ देता है, खोलता है और बदलने की चुनौती देता है-
मशीन
तुम्‍हें सिखा रही होगी
जीना –
मैं तो इसमें
मरने की
सहूलियत देखता हूं।
भोला है कवि का मन…! भोला न होता तो भला कवि-मन कैसे होता…! हरिण जैसा मन…! दौड़ता है पर हमेशा मरीचिका में नहीं…! कभी-कभी सयाना होकर भी…! अभयारण्‍य भी उसे अभयदान नहीं दे सकते, …तो दौड़ने के सिवा उसके पास विकल्‍प है ही कहां..। यह विकल्‍पहीनता हर उस व्‍यक्ति का हश्र है जो मौजूदा व्‍यवस्‍था का भ्रष्‍ट अंग होना स्‍वीकार नहीं कर रहा..। अपने ग्राम्‍य जीवन की सहजता से परे होकर थोपी गई महानगरीय चाल को झेलता हुआ व्‍यक्ति कहां से चला है, यह तो जानता है, अपनी जड़ें वह भूला नहीं है, लेकिन पहुंचेगा कहां, उसे नहीं पता…! उसे ही क्‍या, किसी को भी नहीं पता…! सुरेन्‍द्र डी सोनी की संवेदना का बहुफलकीय रचना संसार इन कविताओं में झलक भर
को ही सही, दिखता जरुर है। एक बिन्‍दु कैसे अपना गोला बनाता है और ख़ुद इस गोले में घिरा दौड़ता हे, यह सूक्ष्‍म प्रस्थान बिन्‍दु उनका। कम शब्‍दों में पूरी कविता कहना वैसा ही है जैसे एक बिन्‍दु में वृत्त की गोलाई माप लेना, यह काम बखूबी कर पाए हैं वह…। अनंत शुभकामनाएं इस संभावनाशील रचनाकार के प्रति….!
- मायामृग