भारत के आदिवासी इलाकों, वहाँ के जन जीवन, लोक कलाओं, संगीत, नृत्‍य, समस्‍याओं और अकूत नैसर्गिक सौंदर्य के बारे में हमेशा बहुत कुछ जानने की इच्‍छा रही है। एक दो यात्राएं करने का मौका भी मिला है लेकिन यह जानना या भीतर उतरना आम तौर पर बाहरी या औपचारिक ही रहा है। कभी दो चार उपन्‍यास, या रिसर्च पेपर या फिर वहाँ के जनजीवन को दर्शाने वाली दो चार किताबें। यूं कहूं तो आदिवासी जनजीवन को और निकट से जानने की चाह हमेशा बनी रही। अगर मैं कहूं कि राजीव रंजन प्रसाद के उपन्‍यास ‘आमचो बस्‍तर’ ने एक साथ मुझे बस्‍तर के इतिहास, भूगोल, समाजशास्‍त्र, अर्थशास्‍त्र, भाषाशास्‍त्र, धर्म, कला, संगीत, संघर्षगाथा, जीजिविषा, परम्‍पराओं और लोकजीवन के सभी रूपों से न केवल कथा रूप में परिचय कराया है बल्‍कि संवेदना के स्‍तर पर गहरे से वहाँ से जोड़ा भी है तो कोई अतिश्‍योक्‍ति नहीं होगी। राजीव ने बताया था कि वे बस्‍तर के भीतरी इलाकों में पढ़े बढ़े हैं, आदिवासी जन जीवन को निकट से जानते पहचानते हैं, उनकी बोली बानी बोलते हैं और सबसे बड़ी बात अपने आप को उस समाज का एक अभिन्‍न अंग मानते हैं। उनकी यही सोच ‘आमचो बस्तर’ को न केवल महत्‍वपूर्ण औपन्‍यासिक कृति के रूप में हमारे सामने लाती है बल्‍कि राजीव की तेज और मार्मिक निगाह हमें बस्‍तर के प्रागैतिहासिक, आध्‍यात्‍मिक और धर्म से जुड़े संदर्भों का अनुभजन्‍य हवाला भी देती चल रही है। आज बस्‍तर जल रहा है। हम सब उन कारणों को भी जानते हैं और वहाँ के जनजीवन के जख्‍मों से भी अनजान नहीं हैं। हम उन पर ऊपर ही ऊपर लेप की तरह लगायी जाने वाली मरहमों के बारे में भी जानते हैं जो इन आदिवासियों के जख्‍मों पर अरसे से लगायी जाती रही हैं और उनके सम्‍पर्क में आने वाला हर पढ़ा लिखा तबका बरसों से उनका शोषण करता आ रहा है। राजीव ने अपने इस उपन्‍यास में सारे खतरे उठाते हुए आदिवासियों के ढ़के छुपे ज़ख्म दिखाने का साहस तो किया ही है, अपनी जान की परवाह न करते हुए उन्‍होंने उन तथाकथित दयावान हाथों की ओर भी उंगली तानी है जिनकी वजह से आदिवासी समाज के विकास की सारी नदियाँ अब तक सूखती आ रही हैं। उपन्‍यास में रोचक कथाओं, गाथाओं, इतिहाससम्‍मत तथ्‍यों और पौराणिक संदर्भों का बखूबी प्रयोग किया गया है और सारी कथाएं आदिवासी समाज की खरी और सच्‍ची भाषा का प्राकृतिक सौंदर्य लिये हमारे सामने जस की तस पेश की गयी हैं। उपन्‍यास में आये पात्र हमें इतने जीवंत और विश्‍वसनीय लगते हैं कि कई बार हैरानी भी होती है जब हम पाते हैं कि राजीव ने अपनी शारीरिक सीमाओं की भी परवाह न उपन्‍यास के सूत्र तलाशने के लिए करके दुर्गम, बीहड़, खतरनाक और कई बार जान लेवा यात्राएं भी की हैं। बस्‍तर के कल की और आज की सही सही तस्‍वीर देखने के लिए राजीव रंजन प्रसाद का यह उपन्‍यास सचमुच उन सभी पाठकों के लिए एक अप्रतिम सौगात है जो अब तक बस्‍तर और वहाँ के जनजीवन को केवल बाहरी तौर पर ही देखते आये थे और उपलब्‍ध जानकारी के हिसाब से वहाँ की एक अलग ही छवि बनाये हुए थे। ‘आमचो बस्‍तर’ बस्‍तर के बारे में अब तक के सारे भ्रम तोड़ता है।

सूरज प्रकाश; मुम्बई  

 

राजीव रंजन प्रसाद का हालिया लिखा उपन्यास  ‘आमचो बस्तर’  अपनी ही धरती पर बेगानों के साथ मिलकर अपनों द्वारा क्रूरता से छिछियाये हुये पीड़ित संसार का इतिहास है, अतीत की गुफाओं में दफ़न किये जा चुके बस्तर के देशभक्त महानायकों की गौरवपूर्ण समाधि बनाने और उन पर श्रृद्धासुमन अर्पित कर बस्तर के इतिहास को पुनर्जीवित करने का सार्थक और स्तुत्य प्रयास है, शोषण की अजस्र प्रवाहित विषधारा के प्रति व्यापक चिंता है, छोटी-छोटी समस्याओं के विराट ज्वालामुखी हैं, विदूप हो ठठाते विकास की कड़वी सच्चायी है,  पत्रकारिता की निष्ठा पर अविश्वास है, गोलियों से बहे निर्दोष ख़ून और मासूम चीखों से अपने अहं को तुष्ट करती सत्ता की कहानी है,  दुनिया के द्वारा ख़ारिज़ किये जा चुके आयातित विचारों की पोटली में छिपे बम हैं….और हैं ढेरों प्रश्न जो किसी भी निष्पक्ष पाठक को झकझोरने, अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने और एक नई क्रांति के लिये पृष्ठभूमि की आवश्यकता पर चिंतन करने को विवश करते हैं।   बस्तर की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास जंगल से दूर किसी महानगर के भव्य भवन के वातानुकूलित कक्ष में सुने-सुनाये मिथकों और कल्पना के सहारे नहीं लिखा गया बल्कि बस्तर के जंगल के भीतर बैठकर लिखा गया। इसीलिये उपन्यास एक ऐतिहासिक अभिलेख बन पड़ा है जिसके अतीत में खोये पात्र अत्याचार के विरुद्ध जूझते हुये और शोषण को अपनी नियति स्वीकार कर चुके आधुनिक पात्र विकास की आशा में बड़ी उत्सुकता से बस्तर से बाहर की ओर झाँकते नज़र आते हैं। गहन वन के अंधेरों को बेचकर ख़ुद के लिये रोशनी का ज़ख़ीरा जमा करते लोग बस्तर के अंधेरों को बनाये रखने के हिमायती हैं। अंधेरों के ख़िलाफ़ लड़ने की कसम खाते हुये कुछ तत्वों ने रूस और चीन से आयातित विचारों के सहारे एक समानांतर सत्ता कायम कर ली है जो अब ख़ुद भी अंधेरे बेचने लगी है। सत्ता के गलियारों में नक्सलवाद और माओवाद एक अज़ूबा फ़ैशन बनता जा रहा है जिसे समझने और समझाने की कोशिश में लेखक ने आदिवासी समाज की एनाटॉमी, प्रशासन की फ़िज़ियोलोजी और सत्ता की पैथो-फ़िज़ियोलॉजी का पूरी ईमानदारी के साथ विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण के प्रयास में एक कुशल जुलाहे की भूमिका निभाते हुये लेखक को अपनी बीविंग मशीन में आगे-पीछे के कई तानों-बानों को आपस में पिरोना पड़ा है जिसके कारण यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कई कहानियों को अपने में समेट कर चल सकने में समर्थ हो सका। बस्तर को दूर बैठकर करीब से देखने का एक अवसर है “आमचो बस्तर”।

  डॉ. कौशलेन्द्र, कांकेर

 

सदियों पुराना अनुभव दोहरा रहा हूँ। उत्थान की चोटी तक पहुँचते पहुँचते जीवन व्यतीत हो जाता है किंतु पतन की कगार से गिरने की गति तीव्रतम होती है और पल भर में तल छू जाता है। यदि यही बात मानवीय सभ्यताओं एवं सामाजिक संस्कृतियों के व्यापक अर्थ में देखी जाये तो बात सहस्त्राब्दियों से आरंभ हो कर मात्र कुछ वर्षों में सिमट कर रह जाती है; छत्तीसगढ राज्य में अवस्थित बस्तर अंचल के संदर्भ में एसा ही कुछ कहना अतोश्योक्ति नहीं होगी। वर्तमान में आतंक तथा भयादोहन का पर्याय बन चुके माओवाद रूपी अजगर की कुण्डली में लिपटा, पल पल टूटता सा बस्तर एवं उसके आस पास का क्षेत्र अपने गौरवमयी अतीत एवं प्रचुर खनिज तथा वन सम्पदा की सुदृढ़ संरचना के बावजूद टूट रहा है। बस्तर के भोलेभाले, मेहनतकश समुदाय को एक लम्बी त्रासदी से निरंतर जूझना पड़ रहा है। क्या है इसका स्वर्णिम अतीत और क्या हैं इसके यक्ष प्रश्न इन्ही ज्वलंत विन्दुओं को समेटता लपेटता इतिहास और मिथक की अबूझ गलियों से गुजरता राजीव रंजन प्रसाद का उपन्यास “आमचो बस्तर” एक संग्रहणीय एतिहासिक दस्तावेज़ है। इस उपन्यास में हजारो वर्ष की पौराणिक कथा यात्रा, इतिहास के विभिन्न चरण एवं वर्तमान के पात्रों का अद्भुत समन्वयी प्रयोग किया गया है; यह आमचो बस्तर को  प्रयोगवादी उपन्यास बनाता है। किसी भी लेखक का अपने प्रथम उपन्यास में इस तरह का प्रयोग निस्संदेह लेखकीय दुस्साहस ही कहा जायेगा। आज के बस्तर के आलोक में राजीव रंजन प्रसाद अपने उपन्यास में माओवाद के रूप में खड़े एक बड़े यक्षप्रश्न को समझने हेतु बड़ी सरलता से बहुत सारी तथ्यपरक बातें अपने पात्रों के माध्यम से कह जाते है। बस्तर सहित भारत का वनांचल रेड कॉरीडोर की परिकल्पना को ले कर घेरते जा रहे अजगर की कुण्डली में फँसा है। सन 2040 तक नक्सली शासन और सत्ता अपने हाथ में ले लेने का निरंतर कुचक्र रच रहे हैं और उत्तरदायी व्यवस्था इन सभी का सतही समाधान करते हुए आत्ममुग्ध है। ऐसे में ‘आमचो बस्तर’ इस विकट परिस्थिति का समेकित एक्सरे पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करता है। रोचक कथानक एवं प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह उपन्यास मुख्यत: एक अनूठी संदर्भपरक कृति है जो आने वाले समय में कालजयी सिद्ध होगी। इस उपन्यास की सफलता इसके निरंतर छपते जा रहे संस्करणों से सर्वसिद्ध है।

श्रीकांत मिश्र कांत; कोलकाता

 

Amcho Bastar / आमचो बस्तर  

पुस्तक :आमचो बस्तर
लेखक : राजीव रंजन प्रसाद
प्रकाशक : यश प्रकाशन

 

Amcho Bastar / आमचो बस्तर