मौन मगध में: उस इतिहास के खिलाफ जो व्रेपर में लपेट कर मुहैय्या कराया जाता है – विश्वदीपक ‘तनहा’
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इतिहास बुद्धिजीवियों के ड्राईंगरूम में सजाया कोई फ्लावर-पॉट, कोई गुलदस्ता नहीं, जिसे देखने, सराहने या कोसने का पहला और आखिरी हक़ सिर्फ़ सेल्फ़ में रखी चंद किताबों का हो। यह एक बहती हुई नदी है, जिसमें हर ज़रूरतमंद, हर जिज्ञासु अपनी नाव उतार सकता है, जाल डालकर खुद हीं मछलियाँ जमा कर सकता है और अपने हिसाब से पानी को साफ या गंदला बता सकता है। इतिहास को अगर महज़ पन्नों पे पिन करके रखा जाए या उन्हीं कुछेक पन्नों के हिसाब से इसकी सार्थकता साबित की जाए तो पुराने रासन की तरह इसमें बदबू उतरने लगती है। इतिहास सतत खंगाले जाने की माँग करता है और यह काम ऐतिहासिक स्थलों की खाक छानने, उन खंडहरों की खाक में जीवित बुजुर्गों से मुखर होने एवं तात्कालिक वस्तुस्थिति को आज के सरोकारों की नज़र से देखने से हीं संभव किया जा सकता है। राजीव रंजन प्रसाद अपनी पुस्तक “मौन मगध में” के हर पृष्ठ पर इसी प्रयास में संलग्न दिखते हैं।

राजीव मगध की बात करते हैं, लेकिन इनका मगध केवल चाणक्य या चंद्रगुप्त मौर्य तक सीमित नहीं है। इनके मगध में समुद्रगुप्त का विजय अभियान है, अशोक के शिलालेख हैं जो आटविक जनपद यानि कि बस्तर और आस-पास के आदिवासियों को चेतावनी देते नज़र आते हैं, भागलपुर का विक्रमशिला विश्वविद्यालय है, नालंदा है, वैशाली है तो साथ में बख्तियार खिलजी भी है, जिसे कमसमझ बख्तियारपुर पीर की तरह पूजता है, लेकिन राजीव कोसते हुए भी न अघाते हैं। इनके मगध में कपिलवस्तु के बुद्ध हैं, तो कुण्डलपुर के महावीर भी। मिथकों से परे जरासंध भी वहीं निवास करता है, जिसके परिप्रेक्ष्य में मध्यममार्गी श्रीकृष्ण कभी रणछोड़ तो कभी विराट-रूपधारी गीतावाचक का भेष धरते हैं। राजीव का मगध केवल रहने की जगह नहीं है, न हीं यह विचारधाराओं का पोषक है, बल्कि यह विचारों का कॉस्मोपॉलिटन है, जहाँ मुख्तलिफ विचार अपने शुद्ध स्वरूप में एक साथ वास करते हैं। यहाँ आपको ओशो भी साँसें लेते दिख जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यकीन मानिए आपको ह्वेनसांग भी यहीं दिखेंगे।

राजीव श्रीकांत वर्मा के “मगध किधर” है का एक छोर पकड़कर आगे बढते हैं। इन्हें मगध को जीना है ,इसलिए ये नालंदा की सड़कों को टमटम की गति से नापते हैं, बाईक के चक्कों की धूल ओढकर बोधगया और उसके इर्द-गिर्द के गाँवों की सूरत-ए-हाल दर्ज़ करते हैं, रद्दी की किताबों में पालि भाषा के अमूल्य हस्ताक्षर खोज़ निकालते हैं, भागलपुर के एक जर्जर पुस्तकालय का दर्द बयान करते हैं तो वहीं सिलाव के ’खाजा’ में मगध या यूँ कहिए कि बिहार की पुरानी परंपराओं की मिठास को मौजूद बताते हैं। राजीव मगध को जानने के लिए मगध की हवाओं को निगलते हैं, न कि दूर कहीं बैठकर नाक-भौं सिकोड़ते हुए तोहमत ठेलते हैं। ये टूटी इमारतों के अंदर उतरते हैं और ईंटों से उनकी आपबीती पूछते हैं। अफसोस जताते हैं कि जो कुछ बाहर आ चुका है, उसे समझने वाले कम हीं हैं, वहीं बहुत कुछ तो बाहर आया हीं नहीं। ये मानते हैं कि समाज को इतिहास रैपर में लपेटकर मुहैया कराया गया है, जिसके “इनग्रैडिएंट्स” पढकर हीं आज की पीढी अपने पूर्वजों का चरित्र-चित्रण करती है। राजीव इसी रैपर को खुरचने के लिए पिटकों को पढते हैं, सारिपुत्र की शरण में जाते हैं, स्थूलभद्र और भद्रबाहु से श्वेतांबरों और दिगंबरों के राज पूछते हैं और फिर अंत में कल और आज की परिस्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

राजीव मगध के नहीं हैं, बस्तरिया हैं, बस्तर से आए हैं। लेकिन इन्हें पढकर यही लगता है कि मगध जितना हमारा है, उतना हीं या उससे भी कहीं ज्यादा इनका हो चुका है। इन्हें अपने भोंगा देवता की खोज़ थी, जिनमें छुपे बुद्ध को ढूँढने के लिए ये गंगा के इस ओर आ पहुँचे थे। लेकिन इनके इस अभियान ने मगध के अतीत और वर्तमान की खुदाई कर दी। इन्हें मगध में दो धुरियों पर ठहरा वक़्त नज़र आया। मौन मगध में / Maun Magadh me राजीव रंजन प्रसाद Rajeev Ranjan Prasadवक़्त का एक कारवां कुछ सौ ईसापूर्व से लेकर पालवंश और फिर बख्तियार खिलजी की दुर्दम्य प्रतारणाओं के एक दौर तक अटका हुआ है तो वहीं दूसरा पटना की तथाकथित विकसित सड़कों पर ग़ाफ़िल-सा सरपट दौड़ रहा है। इन दो धुरियों के बीच मगध सवाल की टोकरी लिए मौन खड़ा है। कई सवाल है… मसलन स्वर्णिम अतीत से सजा यह महाजनपद आज अपने सबसे बड़े शहर पटना को महानगरों की गिनती में भी शामिल क्यों नहीं कर पाता? कमी कहाँ रह गई? कमी कहाँ है? दोषी कौन है? राजीव सवाल पूछ कर हीं अपने कर्तव्यों की इति-श्री नहीं मानते, बल्कि जवाब भी सुझाते हैं, बशर्ते इन्हें सुना जाए…. इन्हें पढा जाए।

कुल-मिलाकर मैं यही कहूँगा कि अतीत के एक बड़े हिस्से पर एक बड़ी महत्वपूर्ण किताब जो सालों से अपेक्षित थी, आज “मौन मगध में” के रूप में उपलब्ध हो गई है। राजीव इस प्रयास के लिए बधाई के पात्र हैं।

मौन मगध में – यश पब्लिकेशन, नवीन शहादरा, नई दिल्ली से प्रकाशित
लेखक – राजीव रंजन प्रसाद
मूल्य – सजिल्द 250 रुपये तथा अजिल्द 95 रुपये।
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