Buy Raag Darbari (Hindi): Book

राग दरबारी श्री लाल शुक्ल, उनकी सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य के लिए जाना जाता है. इस उपन्यास के लिए 1970 में सबसे बड़े भारतीय साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
राग दरबारी भारतीय समाज आजादी के बाद में नैतिक मूल्यों में क्षय पर एक व्यंग्य नज़र लेता है. यह राजनीतिज्ञों, व्यवसायियों, अपराधियों, और पुलिसकर्मियों के बीच सांठगांठ को उजागर करता है, और वे स्वार्थ के लिए समाज का फायदा उठाने के लिए सांठ – गांठ करते है और बुद्धिजीवियों की लाचारी को उजागर करता है.

उपन्यास  इतिहास में एक शोध छात्र  रंगनाथ के नजरिये से लिखा गया है जो कुछ ही महीनों के लिए शिवपाल गंज नाम के एक गांव में अपने चाचा के  साथ रहने के लिए आता है .
रंगनाथ देखता है की कैसे चाचा , गांव के सभी संस्थाओं का राजनितिक उद्देश्य के लिए दुरूपयोग करता है . यह उनके चाचा और क्षुद्र गांव नेताओं के आचरण रंगनाथ अपने विश्वविद्यालय से सीखे आदर्श और शिक्षा से बिलकुल विपरीत है.
इस पुस्तक में लेखक एक शिक्षित व्यक्ति के दृष्टिकोण के माध्यम से ग्रामीण जीवन के नकारात्मक पहलुओं को उजागर करने का प्रयास है. पुस्तक में अन्य पात्रों के सहायता से लाचार बताया है की आम आदमी को कोई विकल्प नहीं है और सत्ता में भ्रष्ट लोगों के सामने सर झुकना पड़ता है. .

 

श्री लाल शुक्ल  ने  शिवपालगंज के रूप में अपनी अद्भुत भाषा शैली, मिथकीय शिल्प और देशज मुहावरों से गढ़ा था। त्रासदियों और विडंबनाओं के इसी साम्य ने ‘राग दरबारी’ को महान कृति बनाया, तो इस कृति ने श्रीलाल शुक्ल को महान लेखक। राग दरबारी व्यंग्य है या उपन्यास, यह एक श्रेष्ठ रचना है, जिसकी तसदीक करोड़ों पाठकों ने की है और कर रहे हैं।

राग दरबारी में  शिक्षा व्यवस्था पर भी व्यंग्य  किया गया है,  देश के अनेक सकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय है। उनके पास अच्छा भवन तक नहीं है। कहीं कहीं तो तंबुओं में कक्षाएँ चलाती हैं, अर्थात न्यूतम सुविधाओं का भी अभाव है। श्रीलाल शुक्ल इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि -

“यही हाल ‘राग दरबारी’ के छंगामल विद्‍यालय इंटरमीडियेट कॉलेज का भी है, जहाँ से इंटरमीडियेट पास करने वाले लड़के सिर्फ इमारत के आधार पर कह सकते हैं, सैनिटरी फिटिंग किस चिड़िया का नाम है। हमने विलायती तालीम तक देशी परंपरा में पाई है और इसीलिए हमें देखो, हम आज भी उतने ही प्राकृत हैं, हमारे इतना पढ़ लेने पर भी हमारा पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है।”

विडंबना यह है कि आज कल अध्यापक भी अध्यपन के अलावा सब कुछ करते हैं। ‘राग दरबारी’ के मास्टर मोतीराम की तरह वे कक्षा में पढ़ाते कम हैं और ज़्यादा समय अपनी आटे की चक्‍की को समर्पित करते हैं। ज़्यादातर शिक्षक मोतीराम ही हैं, नाम भले ही कुछ भी हो। ट्‍यूशन लेते हैं, दुकान चलाते हैं और तरह तरह के निजी धंधे करते हैं। छात्रों को देने के लिए उनके पास समय कहाँ बचता है?

राग दरबारी एक सर्व कालीन रचना है को आज भी भारतीय समाज में सभी जगह देखा जा सकता है. सरे घटना क्रम और कहानी को रोचकता और व्यंग के साथ पिरोया गया है.

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