ek gadhe ki aatmkatha
एक गधे की आत्मकथा / कृश्न चन्दर

“एक गधे की आत्मकथा” कृश्न चन्दर जी की बहुत ही सधी हुई व्यंग्य कृति है| आप पूरी पुस्तक पढ़ डालिये, फिर भी आप इसी पसोपेश में रहेंगे कि ये आदमी के रूप में गधा है या गधे के रूप में आदमी|
इस संग्रह में उन्होने गधे के माध्यम से पूरे सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक ढाँचे पर प्रहार किये हैं| मुख्य पात्र एक गधा है| उसी के मुख से सारी कहानी कही गयी है| कैसे वह बाराबंकी में ईंट ढ़ोने के काम से छुटकारा पाकर देश की राजधानी दिल्ली गया, कैसे वहाँ रामू धोबी से मुलाक़ात हुई, और रामू धोबी की मृत्यु के बाद उसके परिवार के भरण पोषण हेतु गधे ने कहाँ कहाँ चक्कर लगाये, कितनी ठोकरें और लातें खाईं, इन सब का बड़ा ही सजीव और रोचक वर्णन है| पुस्तक के प्रारम्भ में ही लेखक कहता है – “इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा”|

गधा रामू धोबी के यहाँ काम करने लगा था| एकाएक रामू की मृत्यु मगरमच्छ के हमले से हो जाती है| अब उसका परिवार भूखों मरने की हालत में आ जाता है| गधा मुसीबत के वक्त में उनका साथ देने का निश्चय करता है| गधे की खासियत है कि “वो इंसान की भाषा में बोलता है” | जब लोग आश्चर्य करते हैं कि ये तो गधा है, इंसान जैसा कैसे बोल रहा है तब कृश्न चंदर के लेखन का पैनापन देखने लायक है| उनका गधा तपाक से उत्तर देता है कि जब इंसान इंसान होकर गधों के जैसा बोल सकता है तो गधा इंसान जैसा क्यूँ नहीं बोल सकता| लेखक ने एक जगह लिखा है – “नई दिल्ली में ऐसे तो बहुत लोग होंगे जो इंसान होकर गधों की तरह बातें करते हों लेकिन एक ऐसा गधा, जो गधा होकर इंसानों की सी बात करे, हेडकान्स्टेबल ने आज तक देखा सुना न था।”

रामू के परिवार के लिये जीविका के बंदोबस्त के लिये बेचारा गधा इस कार्यालय से उस कार्यालय घूमते- घूमते परेशान हो जाता है| हर कोई उसे अगले ऑफिस भेजकर छुटकारा पा लेता है | वित्त मंत्री, मत्स्य विभाग, मजदूर यूनियन आदि से निराश होकर आखिर में गधा प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने का निर्णय करता है| नेहरू से गधे की मुलाक़ात बड़ी रोचक है| ज्ञान विज्ञान, पंचशील, पंचवर्षीय योजना आदि विषयों पर नेहरू और गधे का संवाद होता है| नेहरू गधे की सवारी भी करते हैं|  फिर तो गधे की किस्मत ही बदल जाती है| उसके बाद तो वो गधा पूरे देश में प्रसिद्ध हो जाता है| विदेशी पत्रकार भी उसके साक्षात्कार लेते हैं| उसके बाद गधे के साथ क्या क्या होता है, बहुत ही रोचक घटनाक्रम है|

पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी है| भाषा प्रांजल और स्वाभाविक है, शैली मारक है| शोषित वर्ग के लिये सहानुभूति लेखक की हर पंक्ति से प्रकट होती है| गधे को माध्यम बनाकर लेखक ने सौदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन पर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं| सौंदर्य की परिभाषायें दी हैं| एक बड़ा मजेदार प्रसंग है जब गधा साहित्य अकादमी की बैठक में पहुँच जाता है| गधा सवाल करता है कि उनके लिये आप क्या कर रहे हैं जो बहुत अच्छा लिख सकते थे पर भूख और गरीबी ने उन्हें लिखने नहीं दिया|

उदाहरणस्वरूप पुस्तक के कुछ अंश प्रस्तुत हैं:

1-   बाराबंकी से दिल्ली यात्रा के बीच:

“मौलवी- अच्छा, यह बताओ, तुम हिन्दू हो या मुसलमान ? फिर हम फैसला करेंगे।
मैं-हुजूर, न मैं हिन्दू हूं न मुसलमान। मैं तो बस एक गधा हूं और गधे का कोई मज़हब नहीं होता।
मौलवी-मेंरे सवाल का ठीक-ठीक जवाब दो।
मैं-ठीक ही तो कह रहा हूं। एक मुसलमान या तो हिन्दू गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता।

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2-   गधे का दिल्ली आगमन और उसके द्वारा देखी गयी दिल्ली

//दिल्ली का भूगोल

“इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था,

असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ “

मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा।“

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“दिल्ली में नई दिल्ली है और नई दिल्ली में कनाटप्लेस है। कनाटप्लेस बड़ी सुन्दर जगह है। शाम के समय मैंने देखा कि लोग लोहे के गधों पर सवार होकर इसकी गोल सड़कों पर घूम रहे हैं। यह लोहे का गधा हमसे तेज़ भाग सकता है, परन्तु हमारी तरह आवाज़ नहीं निकाल सकता। यहां पर मैंने बहुत से लोगों को भेड़ की खाल के बालों के कपड़े पहने हुए देखा है। स्त्रियां अपने मुँह और नाखून रंगती हैं, और अपने बालों को इस प्रकार ऊंचा करके बांधती हैं कि दूर से वे बिल्कुल गधे के कान मालूम होते हैं। अर्थात् इन लोगों को गधे बनने का कितना शौक है, यह आज मालूम हुआ।“

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“यह तो कोमलांगियों की मजबूरी है कि वे सदा सुन्दर गधों पर मुग्ध होती हैं| “
~ पद्म भूषण कृश्न चन्दर (1914-1977)

 

::  सम्पादक मंडल