Indian Literature

Indian Literature

वर्तमान परिदृश्य में, यह बहुत दुख की बात कि नई पीढ़ी पूरी तरह से (या काफी हद तक) भारतीय साहित्य, उनकी अपनी मातृभाषा से जुड़ी साहित्य सम्पदा अनभिज्ञ है। मीडिया भी प्रायः अंग्रेजी भाषा और इसके साहित्य की ओर झुकाव रखते हुवे (कुछ हद तक पक्षपाती) नज़र आती है।ऐसा लगता है कि जैसे कई लोगों को एक हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा की पुस्तक पढते देखे जाने में शर्म आती है, वे एक अंग्रेजी किताब पढते हुए  देखा जाना चाहते हैं. मैं एक अंग्रेजी लेखक (जिनकी पुस्तक अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओँ में प्रकाशित होती हैं) की एक बात का उल्लेख करना चाहुगा कि एक कॉलेज के छात्र दोनों संस्करने खरीदता था ताकि हिंदी किताब घर पर पढ़ सके और अंग्रेजी संस्करण को कॉलेज ले जा सके ताकि साथियों को यही लगे की वो सिर्फ अंग्रेजी किताब ही पढ़ता है।
भारतीय साहित्य के लिए पाठकों (कमी) की गिरावट के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं.
मुख्यतः अंग्रेजी हमारी शिक्षा का माध्यम है, शायद यह लोगों को “अंग्रेजी” में सोचने के लिए मजबूर करता है है।
भारतीय माता पिता अपने बच्चों के लिए विभिन्न लोकप्रिय पत्रिकाएँ  (जैसे चंदामामा, नंदन, चम्पक, बालहंस, हंस आदि) को भारतीय भाषा के बजाय अंग्रेजी संस्करण दिलाना ज्यादा पसंद करते हैं।

अंग्रेजी भाषा और साहित्य पर अतिवरीयता की बारे में मेरी टिप्पणी को उसके महत्व को नकारने और विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।इसमें कोई शक नहीं है कि आज अंग्रेजी विश्व भाषा है और यह एक बुद्धिमानी की बात नहीं होगी की हम अंग्रेजी भाषा और साहित्य का तिरस्कार करें। मेरा इतना ही कहना है कि भारतीय भाषाओं और साहित्य को उचित सम्मान और महत्व दिया जाना चाहिए. हम अपनी लाइन, अन्य लाइन (विदेशी भाषा साहित्य) को मिटाए बिना भी बड़ा कर सकते हैं।

सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए और अस्तित्व की रक्षा के गंभीर प्रयास होना चाहिए। बड़े प्रकाशन गृहों को आगे आकर भारतीय साहित्य और लेखकों को बढ़ावा देना चाहिए।भारत “कालिदास” की भूमि है और वहाँ हमेशा भारतीय साहित्य के लिए अपार संभावनाएं और  महान साहित्य रचना करने वाली प्रतिभाएं उपलब्ध है।1. भारतीय भाषाओं और साहित्य के समर्थन करने के लिए सरकार एक राष्ट्र-नीति  बनाना चाहिए।
2.भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद  को सरकार, प्रमुख प्रकाशक वर्ग द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।

3. माता – पिता को अपने बच्चों को क्षेत्रीय भाषा के साहित्य को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।4. सरकार और अन्य इच्छुक पार्टियों भारतीय भाषा साहित्य की पहुँच और सामर्थ्य में सुधार करने की ओर काम करना चाहिए।

मैं भारतीय भाषाओं  में अच्छी पुस्तकों उपलब्ध कराने के लिए www.prathambooks.org की सराहना करता हूँ।

इस संदर्भ में, मैं यह भी उल्लेख करना चाहता हूँ कि हाल के समय में, भारतीयों में योग(समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन की कला और विज्ञान)  और आयुर्वेद (भारतीय चिकित्सा प्रणाली) के महत्व को लेकर कुछ जागरूकता आई है। तो कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जब तक अपने चीजों के महत्व को स्वीकार नहीं करना चाहते जब तक कोई अन्य उसकी  पुष्टि ना कर दे।

इस विषय पर आपका क्या विचार है. बच्चों, किशोरों और युवाओं के बीच भारतीय साहित्य को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है?
In the current scenario, it is very sad to see that new generation is completely (or largely) ignorant of rich history of Indian Literature, literature from their own mother tongue. Media is also highly inclined (somewhat biased) towards English language and its literature.
It seems that many people are ashamed of being seen reading a Hindi/Regional languages book; they’d like to be seen reading an English book. I remember an instance mentioned by one of the English Authors(whose book got published in English and  Hindi as well) that one college student used to buy both versions of his book, one to read at home and other to carry to college so that he can show-off reading the English book.
There are multiple factors responsible for decline of (lack of) readers for Indian Literature.
English being the medium of education, probably force people to think in “English”, and probably parents are discouraged to provide their kids various popular magazine (e.g. Chandamama, Nandan, Champak, BalHans, Hans etc) also available in Indian language version instead they prefer English version of same Magazine.
My comment towards over preference to English Language and Literature should not be mistaken to disapprove its importance and opposition to it. While there is no doubt that today English is a world language and it could not be a wise thing to avoid it completely. My point is that Indian Languages and literature should be given its due respect and importance.  I am only saying that we can make the line bigger (Indian Literature) without erasing the other line (Foreign languages Literature) to make it shorter.
There should be genuine efforts to promote and protect existence of all the Indian Languages. Big publication houses should come forwards to promote Indian Literature and authors.
This is land of “Kalidas” and there is always huge potential of Indian Literature and there are bright
talents to create great literature.
1. Govt. should have a nation policy (well discussed and circulated) to support Indian languages and Literature.

2.Translation among Indian languages should be supported by Govt., Leading Publishers etc.
3. Parents should encourage their kids to read regional language literature
4. Govt. and other interested parties should work toward improving accessibility and affordability of Indian language Literature.
I appreciate www.prathambooks.org for making good books available in Indian languages.

What is your view on this subject. What could be best way to promote Indian literature among kids, teen and youths.

In this context, I would also like mention that in recent time, Indians are started recognised importance of Yog (Art and Science of holistic health management) and Ayurveda (Indian Medicine System), sometime I feel that we don’t appreciate until unless “someone else” confirm that.

Look forward for your inputs………..